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ज्यादा सोच- विचार से बढ़ती हैं उलझनें ! Jyaada Soch Vichaar Se Badhatee Hain Ulajhanen

किसी कार्य के बारे में बहुत ज्यादा सोचने से यही बेहतर है कि उंस पर काम शुरू कर दिया जाए। बचपन से मुझे लिखने से चिढ़ थी। इसका कारण यह है कि मेरे लेखन माकरण की काफी गलतियां होती, मेरी तबीयत बहुत खराब है। इस वजह से में लिखने में अपना समय और ऊर्जा बर्बाद क्यों करू, लिखने की अपेक्षा बोलकर अपनी बातों को दूसरों तक पहुंचाना ज्यादा सरल है। काफी समय तक ऐसा ही चलता रहा।  आखिर फरवरी 2007 में मेरे गुरु ने भुझे अपने नेतृत्व संबंधी अनुभवों को कागज पर उतारने के लिए मजबूर किया। मैं इसके लिए हिचक रहा था और मैंने न लिखने के लिए उनसे हजार बहाने बनाए. लेकिन गुरु पीछे पड़ गए और उन्होंने मुझे बचने का कोई मौका नहीं दिया। आखिर मैंने अपने विचारों को लेखनबद्ध करना शुरू किया। मेरे लिए लिखना वाकई कठिन था और अपनी मर्जी के बिरुद्ध यह कार्य करने के कारण मैं अक्सर दिमागी उलझन में फंस जाता, लेकिन धीरे-धीरे सब कुछ ठीक होने लगा और मेरे लेखन में प्रवाह आ गया।    इससे मुझे एक महत्वपूर्ण सबक मिला - किसी कार्य के बारे में बहुत ज्यादा सोचने से वही बेहतर है कि उस पर काम शुरू कर दिया जाए।' सोचना ...